मोरी लाज -
( तर्ज : मोहे पनघटपे नन्दलाल ... )
मोरी लाज आज
साँवरियों राख लिजोरे ।
मोहे भक्ति - प्रेम दान औ ,
ईमान दिजोरे ! ॥ टेक ॥
भूला हूँ माया में ,
मानव की काया में ।
विषयों की छाया में ॥
अब न चाहँ बहिरन के
सँग रिझोरे ! ।।१ ।।
क्रोध के मदसे तंग
भयो आफत से ,
काम गयो हिम्मत से ||
तंग भयो आफत से
काम-क्रोध के मदसे
हार गयो हिम्मत से
आज समझ - बूझ
कही निभाव किजो रे !
चरणन में भक्ति होय ,
आँखिया तुम प्रेम रोय
और नही चाहू कोय
सुमरन हर स्वॉस चले ,
दास किजो रे ! || ३ ||
तुकड्याने ठान लिया ,
निश्चय जिव - दान दिया ।
अब न हटूं प्राण गया ॥
कृष्णचन्द्र मुरलीधर
उर बजोरे || ४ ||
पिंपलगाँव , ( आंध्र . )
दि . ८ .९. ६२
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